उत्तराखंड का मोटा अनाज स्वाद और पौष्टिकता के हर पैमाने पर खरा उतरता है। मोदी सरकार मोटे अनाजों को वैश्विक ब्रांड बनाने की कोशिश में लगी है। उत्तराखंड में मोटे अनाज की खेती 50 प्रतिशत घटी है। यहां मोटे अनाज की 13 प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। गढ़वाल केन्द्रीय विवि के वैज्ञानिकों द्वारा जिसमें विवि का अर्थशास्त्र विभाग, हेप्रेक विभाग, गृह विज्ञान विभाग और जीबी पंत विवि के संयुक्त शोध में मोटे अनाज की पैदावार को लेकर रिसर्च किया गया। शोध के दौरान पता चला कि कभी 2 लाख हेक्टेयर पर की जाने वाली मोटे अनाज की खेती अब सिमट कर 1 लाख हेक्टेयर ही बची है। इसकी वजहों में पलायन ,जंगली जानवर, बंदर, सुअरों, जंगली भालू का आतंक, ग्लोबल वॉर्मिग शामिल है। गढ़वाल केन्द्रीय विवि के अर्थशास्त्र विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर महेश सती कहते हैं कि अगर मोटे अनाज की खेती पर कार्य नहीं किया गया, तो मंडुवा, झंगोरा, चौलाई की खेती 1 लाख 20 हज़ार हेक्टेयर से घट कर 73 हज़ार हेक्टेयर तक ही सीमित रह जायेगी।
